केंद्रीय बजट 2019-20 : महिला किसानों के सशक्तिकरण के प्रयास में कितना फिट

केंद्रीय बजट 2019-20 : महिला किसानों के सशक्तिकरण के प्रयास में कितना फिट

  • By Jagran
  • 19 Aug, 2019

5 जूलाई 2019 का दिन भारतीय कालखंड में अविस्मरणीय रहेगा. भारतीय स्वतंत्रता के बाद यह दूसरा मौका था कि केन्द्रीय बजट के निर्माण एवं प्रस्तुति का नेतृत्व मातृशक्ति वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने किया . सीतारमण से पहले पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी केंद्रीय बजट 1970 पेश करने वाली अब तक की और एकमात्र महिला थीं.

केन्द्रीय वित्त और कॉरपोरेट कार्य मंत्री निर्मला सीतारामण ने वर्ष 2019-20 का आम बजट पेश करते हुए कहा कि भारत की विकास गाथा में और विशेषकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका एक सुखद अध्याय है . वित्तमंत्री ने कहा कि महिलाओं की व्यापक भागीदारी से ही भारत तेजी से विकास कर सकता है . उन्होंने इस संदर्भ में स्वामी रामकृष्ण परमहंस को स्वामी विवेकानंद द्वारा लिखे गए पत्र का उल्लेख करते हुए कहा, “नारी की स्थिति सुधरे बिना संसार का कल्याण नहीं हो सकता. यह सरकार मानती है कि हम महिलाओं की और अधिक भागीदारी से ही प्रगति कर सकते हैं .

महिलाओं किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में केन्द्रीय बजट में विभिन्न प्रावधानों का उल्लेख किया गया है . 10 हजार नये कृषि उत्पादक संगठन का निर्माण, महिला स्वयं सहायता समूह के लिए ब्याज माफ़ी कार्यक्रम का सभी जिलों तक विस्तार, स्वयं सहायता समूह में से एक सदस्य को मुद्रा योजना के तहत 1 लाख तक का ऋण, स्वयं सहायता समूह के जन-धन खाता से जुड़े हर सदस्य को 5,000 रुपये तक के ओवर ड्राफ्ट की सुविधा, गांवों को बाजार से जोड़ने वाली सड़कों को अपग्रेड किये जाने की योजना, अन्नदाता को उर्जादाता बनाने के लिए विभिन्न योजनाओं का संकल्प एवं कृषि से संबधित ग्रामीण उद्योग में 75 हजार नये उद्यमी तैयार करने से सम्बंधित योजनाओं का निर्माण निश्चय ही स्वागत योग्य कदम है .

अब यक्ष प्रश्न यह है कि क्या इन योजनाओं का क्रियान्वन सचमुच महिला किसानों के सशक्तिकरण के प्रयास में मील का पत्थर साबित होगा ? क्या केंद्रीय बजट 2019-20 महिला किसानों के सशक्तिकरण के मुख्य अवरोधों महिलाओं के लिए सीमित एवं असमान अवसर, उनकी सुरक्षा की अपर्याप्त व्यवस्था, उनके कौशल विकास के लिए अपर्याप्त प्रयास, पूंजी का आभाव, वित्यीय संस्थाओं से उनका सीमित जुडाव, बाजार तक उनकी सीमित पहुँच, मौसम बदलाव एवं गुणवत्तापूर्ण कृषि आदानों की अपर्याप्ता के कारण दिनों – दिन कृषि आय में आ रही कमी तथा लाभकारी योजनाओं तक उनके सीमित पहुँच के सवाल का उत्तर देने में सक्षम होगा ? क्या बजट के निर्माण में जेंडर का परिप्रेक्ष्य समाहित था ?

बिहार जैसे राज्य के लिए यह प्रश्न और भी बड़ा हो जाता है जहाँ रोजगार की तलाश में काफी पुरुषों को पलायन करना पड़ता है परिणामस्वरूप महिलाओं के कंधे पर घर के साथ-साथ कृषि एवं पारिवारिक कारोबार की तिहरी जिम्मेदारी भी आ जाती है . संभावनाओं को और बृहत् करने एवं परिणामों को सुनिश्चित करने के लिए नीति-निर्धारण से लेकर कार्ययोजना के निर्माण एवं कार्यान्वयन तक में उनकी प्राथमिकताओं को ध्यान में रखा जाना महत्वपूर्ण हो जाता है जिनके उत्थान के लिए यह निर्मित हुआ है .

स्वयं सहायता समूह की महिलाओं एवं अन्य लघु एवं सीमान्त महिला किसानों के साथ काम करने के अनुभव के आधार पर विश्लेषण :

  • 5000 रूपये के ओवरड्राफ्ट के लिए जन-धन खाता की अनिवार्यता नहीं होनी चाहिए जिससे इसका लाभ अधिक से अधिक महिलाओं तक पहुंचे.
  • मुद्रा योजना से स्वयं सहायता समूह के केवल एक सदस्य को जोड़ने की सीमा को बढाया जाना चाहिए क्यूंकि कुछ समूहों में 1 से अधिक महिला सदस्य कारोबारी के रूप में आगे बढ़ने के लिए तैयार है वहीँ कुछ समूहों के सदस्यों के लोन की आवश्यकता एवं प्राथमिकता अलग है.
  • महिलाओं के लिए ऋण एवं कारोबार से बड़ी मुश्किल है बाजार, बाजार की प्रतिस्पर्धा एवं आपूर्ति श्रृंखला के हर कदम पर मध्यस्थों का वर्चस्व. इस स्थिति में अगर अपना कृषक उत्पादक संगठन बना भी लिया तो उसकी सफलता को लेकर संशय बना रहता है.
  • देश भर में निर्मित अधिकांश कृषक उत्पादक संगठनों की स्थिति यह बतलाती है की कृषक उत्पादक संगठन के निर्माण से ज्यादा महत्पूर्ण है बनाये गए कृषक उत्पादक संगठन को सुचारू रूप से चलाने के लिए पर्याप्त संसाधन, आवश्यक संरचना एवं बाजार से जुड़ाव की व्यवस्था की जाए .  
  • कई बार देखा गया है कि सही बाजार से जुड़ाव नहीं होने के कारण महिलाओं को अपने उत्पादन के लिए सही गुणवत्ता का कच्चा माल नहीं मिल पाता है और ना हीं उनके उत्पादों को सही मूल्य. अधिकतर यह देखा गया है कि महिला समूह या लघु महिला कारोबारी को अपना उत्पाद मध्यस्थों को काफी कम मूल्य पर बेचना पड़ा .
  • गाँव एवं शहर के अव्यवस्थित बाजार महिलाओं के निजी सुरक्षा के दृष्टी से भी अनुकूल नहीं हैं खास कर अहले सुबह एवं देर शाम का समय इनके लिए सुरक्षित नहीं होता. इसलिए जरुरी है कि इनके लिए ऋण से पहले सुव्यवस्थित एवं सुनियोजित बाजार सुनिश्चित किया जाए.

अनुभव, किये गए प्रयास एवं परिणामों का अगर विश्लेषण करें तो आज स्वयं सहायता समूह की महिलाओं के लिए ऋण से पहले उनके कौशल विकास एवं उत्पादन से पहले इनके लिए बाजार, मूल्य-संवर्धन एवं भण्डारण की व्यवस्था ज्यादा आवश्यक है. ये आवश्यक है की बजट एवं योजनाओं के निर्माण से पूर्व ये जानने की कोशिश की जाये की उनकी प्राथमिकताये क्या है जिनके लिए ये योजनायें बनी है. महिलाये देश से एक ऐसे बजट की उम्मीद रखती हैं जो उनके आर्थिक विकास के साथ साथ उनके सुरक्षा से सम्बंधित प्रश्नों का उत्तर देने में भी सक्षम हो.  

सरकार के साथ-साथ सामजिक संगठनों, व्यापारिक संगठनों, बाजार को नियंत्रित करने वाली विभिन्न समितियों, बैंकिंग संगठनों, व्यापारियों, कृषि आदान एवं कृषि उत्पादन का व्यापार करने वाली कंपनियों तथा व्यापार एवं सहकारिता से जुड़े सभी इकाइयों का ये कर्तव्य बनता है की महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के प्रयासों में अपनी सकारात्मक भूमिका निभाए. देश के बजट के पन्नों से विकास के संकल्प को देश की धरा पर सजीव करने के लिए हर वर्ग की भागी दारी जरुरी है .

महिला सशक्तिकरण के दिशा में किये जाने वाले प्रयासों को आगे लेकर जाने की जिम्मेदारी पुरे देश हैं क्यूंकि ये सिर्फ गाँव, शहर, घर या ऑफिस में नजर आने वाली केवल एक महिला नहीं हैं ये हैं 1/125 करोड़ भारत .  

- प्रेम कुमार आनंद (कार्यक्रम अधिकारी – आर्थिक न्याय, ऑक्सफैम इण्डिया)

(महिलाओं किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए वर्ष 2016 में ऑक्सफैम इंडिया एवं सेवा भारत ने संयुक्त रूप से मुंगेर एवं भागलपुर जिले के 3000 महिला किसानों के साथ एक परियोजना की शुरुआत की. आज इन महिला किसानों ने कृषि की उन्नत तकनीक से न केवल अपने सब्जी के उत्पादन  को बढाया है बल्कि इन्होने अपने व्यापार संचालन के लिये अपने किसान उत्पादक संगठन (कर्ण भूमि कृषि उत्पादक कंपनी लिमिटेड) का पंजीयन भी कराया है. ये महिलाए आज प्रखंड एवं जिले की 18 बाजारों एवं अनेक कृषि आदान विक्रेता कंपनी तक अपनी सीधी पहुँच बना चुकी हैं. ये आज अपनी बैठक में अपने बिजनेश प्लान की भी चर्चा करतीं है और ग्राम-सभा में ग्राम विकास के लिए भी प्लान बनाते नजर आ रहीं है. ये आज अपने अधिकार के लिए किसी भी मंच से अपनी आवाज उठाने में सक्षम हैं.)

Original article here


Related Stories

Others

22 Nov, 2014

na

Trailwalker, an Event of Immense Potential

As Oxfam India prepares for its second trailwalker in January 2013, here are some excerpts from the key reflections of the debut trailwalker in India from John Sayer, Executive Director, Oxfam Hong

Read More

Others

22 Nov, 2014

na

India’s New Middle Classes – Friends of progress or a Political mall-rats?

A Conversational blog written and edited by Duncan Green

One of the topics that kept coming up during my recent trip with Oxfam India was the role of the rising middle classes.

Read More

Others

22 Nov, 2014

na

After a Bleak End to 2012, Hopefully 2013 will Bring some Positive Changes for Indian Women

Oxfam India strongly condemns the brutal sexual assault and subsequent death of a young woman in Delhi and calls for immediate systemic response to the increasing trend of violence against women in

Read More

Others

22 Nov, 2014

na

Intolerance Impeding Innovation

“Why is the sky blue?” This “stupid” question could only be answered through Nobel Prize winning research by C.V. Raman, just as why an apple falls led Newton to gravitational theory.

Read More

img Become an Oxfam Supporter, Sign Up Today One of the most trusted non-profit organisations in India